दरभंगा, बिहार में शराब जब्ती: अवैध शराब तस्करी की बढ़ती समस्या और कानून व्यवस्था पर सवाल

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दरभंगा, बिहार में हाल ही में हुई शराब जब्ती की घटना ने राज्य में अवैध शराब तस्करी की बढ़ती समस्या को एक बार फिर उजागर किया है। पुलिस और सीआईडी टीम ने सिलीगुड़ी से कुशेश्वरस्थान आने वाली एक बस से 114 कार्टन शराब जब्त की, जिसमें विदेशी शराब और बीयर की बड़ी मात्रा शामिल थी। इस घटना में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें बस चालक, कंडक्टर, और अन्य संदिग्ध तस्कर शामिल हैं।  यह घटना बिहार के उन कानूनों की विफलता को उजागर करती है जो राज्य में पूर्ण शराबबंदी के बावजूद भी शराब तस्करी को रोकने में असफल हो रहे हैं। बिहार में शराबबंदी लागू है, लेकिन इस प्रकार की घटनाएं दिखाती हैं कि अवैध शराब का कारोबार अभी भी फल-फूल रहा है।  घटना का मुख्य कारण अवैध शराब की बढ़ती मांग और इसकी तस्करी में शामिल गिरोहों का सक्रिय होना है। इस बस में शराब को आइसक्रीम बनाने के सामान के तौर पर छिपाया गया था, ताकि पुलिस की नजरों से बचा जा सके। पुलिस और सीआईडी की इस कार्रवाई ने तस्करों के इस प्रयास को नाकाम कर दिया, लेकिन यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि इस प्रकार की अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए और क्या कदम...

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव: एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़

 



जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव 2024, देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखे जा रहे हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण और राज्य का केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद, यह पहला अवसर है जब जम्मू-कश्मीर की जनता अपने जनप्रतिनिधियों को सीधे चुनने का मौका पा रही है। 2022 में परिसीमन के बाद विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़कर 90 हो गई है, जिसमें जम्मू में 43 और कश्मीर घाटी में 47 सीटें शामिल हैं। यह चुनाव न केवल क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति बल्कि जनता की मनोदशा को भी स्पष्ट करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।


राजनीतिक पृष्ठभूमि

2014 में हुए विधानसभा चुनाव में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव प्राप्त किया था, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 25 सीटें जीती थीं। हालांकि, किसी भी पार्टी को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, जिससे एक गठबंधन सरकार का गठन हुआ। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन लाया। इस निर्णय ने राज्य की स्वायत्तता को समाप्त कर दिया और केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में अस्थिरता का माहौल पैदा हुआ।


परिसीमन का प्रभाव

2022 में किए गए परिसीमन ने जम्मू और कश्मीर में विधानसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 90 कर दिया। जम्मू क्षेत्र में नए निर्वाचन क्षेत्रों के जुड़ने से राजनीतिक समीकरण में परिवर्तन संभावित है। विशेषकर सांबा, राजौरी और कठुआ जिलों में नए निर्वाचन क्षेत्रों की स्थापना की गई है। वहीं, कश्मीर में कुपवाड़ा को एक अतिरिक्त सीट मिली है। यह परिवर्तन राजनीतिक दलों को नई रणनीतियाँ बनाने और क्षेत्रीय समीकरण को समझने में मदद करेगा।


उपराज्यपाल की भूमिका

2019 के बाद से, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल के पास कई महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं, जिनमें पुलिस और भूमि से संबंधित निर्णय शामिल हैं। निर्वाचित विधानसभा का अधिकार कम कर दिया गया है और उपराज्यपाल को अधिकांश निर्णयों की मंजूरी देनी होती है। यह चुनाव उपराज्यपाल की भूमिका और विधानसभा के अधिकारों की पुनर्स्थापना के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।


चुनाव की चुनौतियां और उम्मीदें

चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर के उत्तरी जिलों में चुनाव कराना है, जहाँ सुरक्षा को लेकर विशेष प्रबंध किए गए हैं। चुनाव आयोग ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए चुनावी प्रक्रिया में सावधानी बरतने की बात की है। सुरक्षा बलों की तैनाती, सुरक्षा योजना और चुनावी तैयारी इस चुनाव की मुख्य चुनौतियाँ हैं। 


राजनीतिक दलों की रणनीति

मुख्य राजनीतिक दल जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC), पीडीपी, कांग्रेस और बीजेपी ने अपने-अपने चुनावी दृष्टिकोण के साथ मैदान में उतर चुके हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने इस चुनाव को लंबे समय से लंबित बताया और इसे क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए आवश्यक कदम कहा। दूसरी ओर, बीजेपी परिसीमन के बाद जम्मू क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस और पीडीपी भी अपनी पुरानी शक्ति को बहाल करने और नए सिरे से शुरुआत करने की उम्मीद कर रही हैं।


भविष्य की दिशा

इस चुनाव के परिणाम जम्मू-कश्मीर के भविष्य को आकार देंगे। यह देखने की बात होगी कि जनता किसे चुनती है और इससे राजनीतिक परिदृश्य में क्या बदलाव आता है। एक दशक के राजनीतिक परिवर्तन के बाद, जम्मू और कश्मीर अंततः अपनी विधानसभा का चुनाव करेगा। नतीजों से यह भी स्पष्ट होगा कि यहां के लोग अपनी नई सरकार, शासन संरचना और उसमें अपनी भूमिका को कैसे देखते हैं।


जम्मू-कश्मीर का यह विधानसभा चुनाव केवल एक सामान्य चुनाव नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के भविष्य को निर्धारित करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। यह चुनाव जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाला है और इसके परिणाम देश की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर इसके प्रभाव को देखते हुए, यह चुनाव देश की राजनीतिक दिशा के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक होगा।



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