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राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक नया विवाद उभरकर सामने आया है, जिसका केंद्र बिंदु गहलोत सरकार के दौरान बनाए गए 17 नए जिले हैं। भजनलाल सरकार ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिससे इन नए जिलों की स्थिति पर असर पड़ सकता है। इस लेख में हम इस आदेश की विस्तार से समीक्षा करेंगे और इसके संभावित प्रभावों पर चर्चा करेंगे।
राजस्थान में नए जिलों की स्थिति
गहलोत सरकार के कार्यकाल के दौरान राजस्थान में 17 नए जिलों का निर्माण किया गया था। ये जिले प्रशासनिक दक्षता और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए थे। नए जिलों में शामिल थे—अलवर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, चूरू, दौसा, डूंगरपुर, जैसलमेर, झुन्झुनू, जोधपुर, कोटा, नागौर, प्रतापगढ़, राजसमंद, सीकर, श्रीगंगानगर, उदयपुर, धौलपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, जालोर, बीकानेर, टोंक, सवाई माधोपुर, पाली, करौली, झालावाड़, हनुमानगढ़, बूंदी, बारां और बांसवाड़ा।
इन जिलों के निर्माण से प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की उम्मीद थी। हालांकि, भजनलाल सरकार के सत्ता में आने के बाद से इन जिलों की स्थिति पर पुनर्विचार की बातें होने लगीं।
भजनलाल सरकार का आदेश और इसकी पृष्ठभूमि
भजनलाल सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी किया है जिसके तहत नए जिलों के राजस्व संबंधित कार्यों का अधिकार पुराने कलेक्टर्स को अगले वित्तीय वर्ष तक सौंपा गया है। इससे पहले, गहलोत सरकार ने 31 मार्च 2024 तक पुराने कलेक्टर्स को यह अधिकार प्रदान किया था। लेकिन भजनलाल सरकार ने इसे बढ़ाकर 31 मार्च 2025 तक कर दिया है।
इस आदेश का उद्देश्य पुराने कलेक्टर्स के अनुभव का लाभ उठाना और नए जिलों के गठन के समय की चुनौतियों को देखते हुए प्रशासनिक कार्यों को सुचारू रूप से चलाना है। इसके साथ ही, भजनलाल सरकार ने नए जिलों की समीक्षा के लिए एक कमेटी भी गठित की है। इस कमेटी की रिपोर्ट के बाद कुछ नए जिलों को खत्म किए जाने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
सियासी हलचल और संभावित प्रभाव
भजनलाल सरकार के इस आदेश ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि यदि उनकी सरकार बनी तो नए जिलों की समीक्षा की जाएगी। अब जब भजनलाल सरकार ने पुराने कलेक्टर्स को अधिकार सौंपा है, यह सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ नए जिलों को वापस पुराने जिलों में मर्ज किया जाएगा।
राजस्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ नए जिले बहुत छोटे हैं और उनकी आबादी तथा सीमांकन की वजह से वे जिले बनाने के मानक पर खरे नहीं उतर रहे हैं। इस स्थिति में, इन जिलों को वापस पुराने जिलों में विलीन करने की संभावना प्रबल हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णय से प्रशासनिक दक्षता में सुधार होगा और साथ ही जनता की समस्याओं का समाधान भी किया जा सकेगा।
भजनलाल सरकार के इस निर्णय से साफ हो गया है कि नए जिलों के भविष्य पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इस वर्ष के अंत तक भजनलाल सरकार नए जिलों पर बड़ा फैसला ले सकती है। यह फैसला राज्य के विकास और प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित कर सकता है।
नए जिलों के अस्तित्व को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी जारी है और जनता भी इस फैसले का इंतजार कर रही है। इससे पहले की सरकारों ने नए जिलों का निर्माण क्षेत्रीय विकास के लिए किया था, अब यह देखना होगा कि वर्तमान सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है।
राजस्थान में नए जिलों के मुद्दे पर भजनलाल सरकार के हालिया आदेश ने राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। पुराने कलेक्टर्स को अधिकार सौंपने और नए जिलों की समीक्षा के निर्णय ने यह संकेत दिया है कि सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारने के लिए गंभीर है। हालांकि, इसके संभावित प्रभाव और परिणामों को लेकर बहस जारी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि राजस्थान में प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य किस दिशा में बढ़ेगा।
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